April 28, 2026

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राजधानी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सुधार की जरूरत

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एसडीसी फाउंडेशन के सरकार और समाज के कई स्टेक होल्डर्स संग देहरादून में पब्लिक ट्रांसपोर्ट राउंडटेबल डायलॉग में आए सुझाव कई विचार
खत्म हो चुकी सड़कों की क्षमता, तत्काल प्लानिंग की जरूरत, मेट्रो रेल, मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट के उपाय जरूरी
बेबाक दुनिया ब्यूरो
देहरादून। बढ़ती आबादी, ट्रैफिक जाम और निजी वाहनों की बढ़ती संख्या को देखते हुए राजधानी की पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, जो राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं है।
बुधवार को एसडीसी फाउंडेशन के सरकार और समाज के कई स्टेक होल्डर्स संग हुई देहरादून में पब्लिक ट्रांसपोर्ट राउंड टेबल डायलॉग में ऐसे कई विचार और सुझाव आए। फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल ने कहा, राज्य गठन से अब तक दून शहर की आबादी कई गुना बढ़ी है। 2041 तक आबादी 24 से 25 लाख तक हो जाएगी। कहा, हमने मेट्रो से लेकर नियो मेट्रो और पॉड टैक्सी तक कई विकल्पों की चर्चा सुनी, लेकिन ठोस पहल नहीं होने से लोगों का इन बातों से भरोसा उठ गया है, जबकि शहर ट्रैफिक की समस्या से बेहाल है। अर्बन ट्रांसपोर्ट के लिए कोई एक विभाग जिम्मेदार न होने से समस्या बढ़ी है। आरटीओ (प्रवर्तन) शैलेश तिवारी ने बताया, राजधानी के मौजूदा पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाने के प्रयास हो रहे हैं। करीब 12 लाख की आबादी पर लगभग 10 लाख वाहन हैं। शहर में 170 सिटी बस, 30 इलेक्ट्रिक बस, 500 टाटा मैजिक, 800 विक्रम, 2500 ऑटो, 4500 ई-रिक्शा हैं।
बताया, कुठालगेट-क्लेमेंटाउन, रायपुर-झाझरा और बल्लूपुर-कुआंवाला तक सर्कुलर रूट की प्लानिंग की जा जारी है। कई मुख्य सड़कों पर आवाजाही बेहतर करने को ई-रिक्शा को प्रतिबंधित किया जा रहा है। दून में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए 30 सीटर की 350 बसों की जरूरत है। जब तक मेट्रो आती है, मौजूदा सिस्टम को ठीक किया जाना चाहिए।
उत्तराखंड मेट्रो के डीजीएम (सिविल) अरुण भट्ट ने बताया, 2019 में देहरादून के लिए कॉम्प्रिहेंसिव मोबिलिटी प्लान तैयार किया था, जो शहर की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था में सुधार का रोडमैप है। दून की ज्यादातर प्रमुख सड़कें अपनी क्षमता का दोहन कर चुकी हैं, इसलिए नए विकल्प पर काम करना ही होगा। नियो मेट्रो अहम समाधान होगा। अभी केंद्र सरकार के सामने योजना विचाराधीन है। दूसरे चरण में नियो मेट्रो फीडर के तौर पर पॉड टैक्सी चलाने की भी योजना है।
उत्तराखंड मेट्रो के पीआरओ गोपाल शर्मा ने बताया, ये परियोजनाएं राजनीतिक इच्छाशक्ति पर भी निर्भर करती हैं। इसलिए जनप्रतिनिधियों की भूमिका अहम हो जाती है। दून में ज्यादातर सड़कें 12 मीटर तक ही चौड़ी हैं। शहर की 12 लाख की आबादी के अलावा यहां आने वाले पयर्टकों का भी आकलन करना होगा। मेट्रो महिला सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद अहम है। पर्यावरणविद डॉ. सौम्या प्रसाद ने दून शहर में आम जनता के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी और महंगे किराये का मुद्दा उठाया।
ऑटो, ई-रिक्शा की मनमानी पर अंकुश के अलावा उन्होंने बस शेल्टर और भरोसेमंद पब्लिक ट्रांसपोर्ट विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने तकनीक और डेटा की मदद से लोगों की ट्रांसपोर्ट से जुड़ी जरूरतों और पैटर्न को समझने का सुझाव भी दिया। वरिष्ठ पत्रकार अजीत सिंह ने कहा, दून में कई विधानसभा क्षेत्र होने के बावजूद पब्लिक ट्रांसपोर्ट चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया, जबकि दून में सड़कों का लैंडयूज बेहद कम है।
कहा, निजी वाहनों पर निर्भरता अत्यधिक है। जब तक अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिटिकल मुद्दा नहीं बनेगा, तब तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत ऐसी ही रहेगी। दून रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष और पार्षद देवेंद्र पाल सिंह मोंटी ने कहा, बेहतर ट्रांसपोर्ट की जरूरत है, पर इसमें साफ तौर पर राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव नजर आता है। विभागों के बीच तालमेल का अभाव है। अफसरों की जिम्मेदारी तय नहीं है। शहर के ट्रैफिक और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था में सुधार के लिए लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
वरिष्ठ पत्रकार संजीव कंडवाल ने कहा, ट्रांसपोर्ट के नाम पर शासन का सारा फोकस रोडवेज पर रहता है, जबकि शहरी ट्रांसपोर्ट की सुध नहीं है। अर्बन ट्रांसपोर्ट की न सिर्फ उपलब्धता बढ़े, बल्कि सुविधाजनक भी हो। उन्होंने दून में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ती जनसंख्या, अतिक्रमण और पब्लिक के दृष्टिकोण से जोड़ने की ज़रूरत पर बल दिया।

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